अब क्या भाजपा में “जीतने” के लिऐ गये हैं “जितिन”

RtvBharat24.

राजनैतिक कथा का”प्रसाद”बन कर रह गये हैं “जितिन प्रसाद”

लखनऊ(Mishra Rohit)
चारो तरफ हो हल्ला है फलां नेता उस पार्टी से उस पार्टी में चला गया। बड़े कद्दावर नेता थे,एक जाति के सिरमौर थे। तमाम प्रकार के मनगढ़ंत सगूफे सोशल मीडिया पर फेंके जा रहे हैं। जी हाँ आप समझ रहे होगें हालिया राजनीति के नायक बने कांग्रेसी नेता रहे पूर्व केन्द्रीय मंत्री जितिन प्रसाद दो दिन से सुर्खियों में बने हैं। बुधवार को जितिन प्रसाद ने कांग्रेस से किनारा कर भाजपा की सदस्यता ले ली। इसके पहले भी लोक सभा चुनाव के ठीक पहले उनके भाजपा में जाने की चर्चा जोरो से हुई थी। उनके सखा मध्य प्रदेश के नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भाजपा का दामन थाम ही लिया था।
जितिन प्रसाद के भाजपा में जाने के बाद सोशल मीडिया पर तमाम कयास लगने शुरू हो गये हैं। कोई उनके भाजपा में शामिल होने का स्वागत कर रहा है तो कोई उनके बारे में गालियाँ बक रहा है। पूरा का पूरा सोशल मीडिया विरोधाभास से भरा पड़ा है। प्रदेश में भाजपा में चल रही सिर फुटव्वल के बीच हुई जितिन की ज्वाईनिंग राजनैतिक कथा का प्रसाद बन कर रह गयी है।

क्या भाजपा में “जीतने” के लिऐ गये हैं “जितिन”

लगातार चुनावों में हार का सामना करने वाले जितिन प्रसाद क्या वाकई में काँग्रेस से नाउम्मीद हो चुके थे या पार्टी में उचित स्थान न मिल पाने से कुंठित जितिन प्रसाद ने भाजपा का दामन थामने का मन बना लिया था। ऐसे कई सवाल उठना लाजिमी है। कभी एक कद्दावर नेता की श्रेणी में आये जितिन प्रसाद का समय के साथ साथ राजनैतिक परिदृश्य पर बैकफुट पर जाना भी भाजपा की ओर आकर्षित करने के लिऐ काफी है वह भी ऐसे हालातो पर जब भाजपा की अंदरूनी कलह आम हो चुकी हो और उसका दिन पर दिन ग्राफ गिर रहा हो तो एक ब्राह्मण नेता के रूप में स्थापित होने का संकेत मिला हो। लोगो में इस बात की चर्चा जोरो पर है कि लगातार हारने वाले जितिन प्रसाद क्या अब भाजपा में जीतने के लिऐ गये है।

जितिन कभी नही रहे ब्राह्मणो के नेता

लगातार तथा लोक सभा चुनावो में करारी हार के बाद जितिन प्रसाद ने कांग्रेस में खुद को ब्राह्मणो का नेता साबित करने के लिऐ ब्राह्मण चेतना परिषद का गठन कर प्रदेश में ब्राह्मणो पर हुऐ अत्याचारों,हत्याओं का विरोध कर एक तरफ सत्ता रूढ भाजपा को घेरकर ब्राह्मणो में जगह बनाने का प्रयास किया तो वहीँ कांग्रेस में खुद को ब्राह्मणो का सिरमौर होने का आभास दिलाने के प्रयत्न शुरू किये। लेकिन बताते हैं कांग्रेस के एक दिग्गज ब्राह्मण नेता ने उनके मंसूबो पर पानी फेर दिया। परिणाम स्वरूप वह कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुचते पहुँचते रह गये।
दरअसल देखा जाऐ तो जितिन प्रसाद कभी भी ब्राम्हणो के सर्व मान्य नेता नही रहे कारण साफ था अपने वर्चस्व के दिनो में उन्होंने कभी भी ब्राम्हणो को आगे बढाने में कोई भूमिका अदा नही की सिवाय कुछ जेबी लोगो को छोड़कर। कहा जा रहा है जितिन प्रसाद भाजपा से छिटके ब्राह्मणो को संभालने के लिऐ भाजपा में एक रणनीति के तहत लाऐ गये हैं। आकड़े गवाह हैं जितिन प्रसाद अपने संसदीय क्षेत्र में ब्राह्मणो के प्रभाव वाले गावों में बुरी तरह नकार दिये गये। मान भी लिया जाऐ जितिन प्रसाद ब्राह्मणो को भाजपा से जोड़ने तथा उनके उत्थान में अहम भूमिका अदा करेंगे तो उन्हे पहले भाजपा में हाशिये पर चल रहे ब्राह्मण नेताओ का उत्थान करना पडेगा। अगर वह वाकई में ब्राह्मणो के बड़के नेता है तो उन्हे सबसे पहले लक्ष्मीकांत बाजपेई जैसे स्वभिमानी नेता का उद्धार करना होगा जो प्रदेश की राजनीति के सीन से लंबे समय से बाहर है। ऐसे तमाम नाम और हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: