सपा का सशक्त होता कैंडिडेट, तो नतीजे होते अलग

RtvBharat24.
*सशक्त होता कैंडिडेट तो जिला पंचायत में बाजी मारती सपा

*सपा को मंथन की महती आवश्यकता

*स्वानत:सुखाय की राजनीति करने वालो के दम पर सपा भावी चुनाव में कैसे मारेगी बाजी ?

सीतापुर। महंगाई,बेरोजगारी,कोरोना काल की दुश्वारियों से भाजपा का ग्राफ आमजनमानस में गिरना शुरू हो गया था। परिणाम स्वरूप पंचायत चुनाव में उसकी बानगी भी देखने को मिली। समूचे जनपद में भाजपा के कद्दावर नेताओ/ जनप्रतिनिधियों के समर्थित प्रधान/जिला पंचायत पद के दावेदार औंधे मुँह हो गये। नतीजन जिले में सत्ता पक्ष भाजपा से अधिक विपक्ष के जिला पंचायत सदस्यों ने बाजी मार ली।
बावजूद इसके जिला पंचायत के अध्यक्ष के चुनाव में सपा बुरी तरह हार गयी। कारण साफ है प्रदेश नेतृत्व की लचर टिकट वितरण प्रकिया ने जीत की ओर अग्रसर होने के बावजूद सशक्त प्रत्याशी पर दांव लगाना मुनासिब नही समझा। दर असल सपा का प्रदेश नेतृत्व कुछ ऐसे लोगो के हाँथ की कठपुलती बन चुका है जिन्हे न तो संगठन की परवाह है और न ही पार्टी की। उन्हे तो बस सबकुछ अपना होना चाहिऐ। पार्टी में वही लोग प्रभावी है जिनकी शोहरत नई नई है।
पार्टी को खाद पानी देने में विश्वास न रखने वाले दिन पर दिन अपना विकास करने में मशगूल है। पार्टी की दुर्गति इतनी कभी नही हुई थी जितनी पाँच-सात वर्षो में हो गयी। जिले के पार्टी से जुड़े वरिष्ठ कद्दावर आज हाशिऐ पर हैं। नतीजन जमीनी पकड़ रखने वाले रामपाल यादव जैसे कद्दावर पार्टी को बाय-बाय कर भाजपा में जा चुके हैं। सूत्र बताते है अभी और लोग जाने के लिऐ मंथन कर रहे हैं। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है अगर पार्टी नेतृत्व सशक्त कैंडिडेट उतारता तो चुनाव परिणाम कुछ और होते। शिवकुमार गुप्ता के नाम पर पार्टी में एकराय न होने के बावजूद भले ही सत्ता पक्ष ने सभी तिकड़म कर जिला पंचायत की सीट पर कब्ज़ा कर लिया लेकिन अगर सपा के पास सशक्त कैंडिडेट होता तो अधिकांश निर्दल जिला पंचायत सदस्य सपा के साथ खड़े होते। चुनाव के एक सप्ताह पहले तक निर्दलीय जिला पंचायत सदस्य शिवकुमार गुप्ता का समर्थन करने के मूड में नही दिखाई दे रहे थे। लेकिन जब उन्हे कोई तवज्जो नही मिली तो थक हार कर निर्दलीयों ने भाजपा का साथ देना मुनासिब समझा। चुनाव का आगाज होते ही जिले में जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर सपा का झंडा बुलंद होगा की सुगबुगाहट शुरू हो गयी थी। कारण साफ था भाजपा के अंदर शिवकुमार गुप्ता के नाम पर एकराय नही बन पा रही थी। वहीं निर्दलीय जिला पंचायत का रूझान सपा की ओर था जिससे पार्टी के जीते व निर्दल सदस्यो की संख्या बहुमत से दूर नही थी। लेकिन कमजोर प्रत्याशी के चलते भाजपा ने आसानी से बाजी जीत ली।
समाजवादी दल को अब काफी मंथन की जरूरत है। क्या पार्टी उन लोगो पर भरोसा कर आने वाले विधान सभा के चुनावी संग्राम में जाना चाहेगी जो स्वानत:सुखाय की राजनीति के दिग्गज हैं जिन्हें पार्टी से ज्यादा अपने प्यादे बैठाने की फिक्र है। पार्टी को उन लोगो पर विश्वास करके पार्टी के खो चुके वर्चस्व को पुनः स्थापित करने की कोशिश में लगना होगा जो भविष्य में जीत का सेहरा बाँध सकने की छमता रखते हो। फिलहाल अगर सपा ने जल्द मंथन शुरू न किया तो जिले में सपा सिर्फ इतिहास की वस्तु बन कर रह जायेगी।

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