महार्षि दधीचि की अस्थियो से बना था वज्र, हुआ था वृत्रासुर संहार

RtvBharat24
कौशलेन्द्र त्रिपाठी
मिश्रिख-सीतापुर। ।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 85 किलोमीटर दूर दधीच कुंड स्थित जिस से मिश्रिख तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है। सतयुग में इस स्थान पर महर्षि दधीचि का आश्रम था महर्षि दधीचि का जन्म सतयुग में भाग मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था। वृत्रासुर नामक देत्य के बध के लिए देवराज इंद्र ने महर्षि दधीचि से उनकी अस्थियों के दान के लिए इसी स्थान पर याचना की थी। महर्षि दधीचि अस्थिदान की कहानी सतयुग में एक बार वृत्रासुर नाम के एक दैत्य ने देव लोक पर आक्रमण कर दिया। देवताओं ने देवलोक की रक्षा के लिए वृत्तासुर पर अपने ही दिये वाणो क़ो वा वस्तुओं को प्रयोग किए लेकिन देवताओं के सभी अस्त्र-शस्त्र वृत्रासुर के कठोर शरीर से टकराकर टुकड़े-टुकड़े हो रहे थे। अंत में देवराज इंद्र सहित सभी देवताओं को अपने प्राण बचाकर देवलोक से भागना पड़ा देवता देवराज इंद्र सहित सभी देवता ब्रह्मा,विष्णु और भगवान  शिव के पास गए। लेकिन तीनों देवों ने कहा कि अभी संसार में ऐसा कोई शस्त्र अस्त्र नहीं है। जिससे बृत्तास और दक्ष का वध हो सके तीनों देवों ऐसी बातें सुनकर देवराज इंद्र मायूस हो गए। देवताओं की दशा देख भगवान शिव ने कहा कि पृथ्वी लोक पर एक महान दानवीर हैं। जिनका नाम दधीचि है उन्होंने तप साधना से अपने शरीर की हड्डियों को अंत: कठोर बना लिया है। उनके आश्रम में जाकर संसार के कल्याण हेतु उनसे प्रार्थना करो और उनकी अस्थियों को दान के लिये आग्रह करो यह सुनकर देवराज इंद्र मिश्रित तीर्थ तपोस्थली पर दधीचि आश्रम पहुंचे।वहाँ पहुंच कर  देवराज इन्द्र ने याचना करते हुऐ कहा कि हे भगवन एक वृत्ताशुर नाम का दैत्य हमसभी का उत्पीड़न कर रहा है।हम सभी देवताओं को परेशान कर रहा है इसकी मृत्यु का रहस्य केवल आपकी हस्तियों में विराजमान है। इसलिए अपनी अस्थियों का दान मुझे प्रदान कर दे। इतना सुनते ही महर्षि दधीचि बोल उठे कि मेरा तो जीवन धन्य हो गया। कि इस प्रथवी पर स्वयंम भगवान देवराज इंद्र याचना करने आऐ हैं। मैं जन कल्याण,विश्व कल्याण,देव कल्याण हेतु।अवश्य दान करूंगा परंतु मैंने समस्त तीर्थों के दर्शन और स्नान करने का संकल्प लिया है। सभी तीर्थ स्नान करने के बाद देव दर्शन प्रतिछड़ा करने के बाद मैं अपनी अस्थियों का दान दे दूंगा। यह सुन इंद्र सोच में पड़ गए। यदि महार्षि दधीचि सभी तीर्थ करने चले गए।तो बहुत समय बीत जाऐगा। इस पर देवराज इंद्र ने संसार के समस्त तीर्थों सहित आकाश,पाताल और मृतलोक के सभी साढे तीन कोटि देवी,देवताओं को मिश्रित तीर्थ नैमिषारण्य की चौरासी कोस कि परिधि में अलग-अलग स्थान प्रदान कर दिया। जिसके बाद फागुन मास की प्रतिपदा को महार्षि दधीचि ने सभी तीर्थों का स्नान कर,देवताओं के दर्शन किए सभी तीर्थों का जल एक कुंड में मिल जाने से इसका नाम मिश्रित तीर्थ पडा। महार्षि दधीचि जी ने अपने शरीर पर नमक और दही लगाकर देवराज इंद्र की सुरा गायों को चटाया जिसके बाद देवराज इंद्र ने हड्डियों को लेकर विश्वकर्मा से कई अस्त निर्माण कराएं। जिनके नाम गांडीव, पिनाक,सारंग और ब्रजर हुआ।ब्रह्माजी के मानस पुत्र अथर्वा थे।अथर्व वेद के मंत्र दृष्टा थे। जिनका विवाह महार्ष कर्दम की पुत्री भगवती शांता से हुआ था। अथर्वा की पत्नी शांता ने दधीचि को सतयुग काल में भाद्रमाह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को अर्धरात से कुछ समय पूर्व जन्म दिया था।महार्षि दधीच को दध्यंग्ड, अथर्वण,(अथर्वनंदन)अश्वशिरा नाम से भी जाना जाता है। विध्या अध्यन के पश्चात दधीचि का विवाह ऋण बिंदु राजा की पुत्री सुवर्चा से हुआ था।सुवर्चा के गर्भ से महर्षि पिप्पलाद का जन्म हुआ। देवराज इंद्र द्वारा महार्षि दधीचि को मधु विद्या का ज्ञान इस शर्त पर कराया कि इस विद्या को किसी अन्य को बताने पर उनका सर काट डाला जाएगा परंतु महार्षि दधीच ने इस विद्या को लोकोपकार के लिए अश्विनी कुमारो के कहने पर उन्हें अपने सिर को अलग करा कर घोड़े के सिर को स्थापित करा लिया और अश्विनी कुमारों को विद्या दे दी। इस से क्रोधित इंद्र ने दधीचि के सर को धड़ से अलग कर दिया। जिसके बाद अश्विनी कुमारों ने दधीचि के पुनः उनके मानव मस्तिष्क को स्थापित कर दिया था।जिसके कारण उनका नाम अश्रशिरा पड़ा दधीचि तीर्थ परिसर में भगवान विष्णु व लक्ष्मी भगवान शंकर पार्वती,माता अष्टभुजा,दधीचेश्रवर महादेव मंदिर के अतिरिक्त महर्षि दधीचि के पिता अथर्वा,माता शांन्ता,पत्नी सुवर्चा,पुत्र पिप्पलाद, बहन दधिमती के मन्दिर स्थापित है।

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